Sunday, 4 May 2014

हमने सुना है!


हमने सुना है लोकसभा चुनाव में इसबार बड़ी हुड़दंग मची है। चरम की जुबानी माराकाटी चल रही है। नेता चचेरे भाईयों की तरह लड़-झगड़ रहे हैं। कोई किसी को पप्पू बुला रहा है तो कोई किसी को फेंकू। चुनावी अखाड़े में कोई कच्चा खिलाड़ी बताया जा रहा है तो किसी के विकास के माॅडल की तुलना टाॅफी से हो रही है। किसी के दीन-दुखियों की सुध-बुध लेने को ‘गरीबी का टूरिज्म‘ करार दिया जा रहा है तो कोई देश के चैकीदार बनने के इच्छुक अभ्यर्थी को रातों-रात जेल की हवा खिलाने की बातें कर रहा है। 
इस सब के बीच एक मौनी बाबा भी हैं जो कुछ भी हो जाए भले ही सत्ता लुट जाए, राजपाट रहे न रहे पर उनका मौन व्रत तोड़ना नामुमकिन है। हमारे नेतागण अपने प्रतिद्वंदी से रिश्ते-नाते जोड़ने में भी पीछे नहीं हैं। पापा की बहन होने के नाते पापा के पुत्र की वह बुआ बन गई हैं तो विरोेधी खेमे की स्टार प्रचारक को चिंटू का स्त्रीलिंग चिंटी बताने के लिए बेटी बनाने से भी गुरेज नहीं किया जा रहा। चुनाव प्रचार के दौरान थप्पड़-लप्पड़ भी खूब चल रहे हैं। किसी खास वर्ग को बोरिया बिस्तर बांधकर पाकिस्तान भेजने के सपने भी देखे जा रहे हैं। हालांकि ऐसे भाषण देने वाले अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम कर रहे हैं और अपनी कंपनी की नई-नई मार्केटिंग पाॅलिसी की धज्जियां उड़ा रहे हैं। पर कुछ भी कहिए आम जनता इस हुड़दंग के खूब मजे लूट रही है। इसके चलते टीवी चैनलों की टीआरपी और अखबरों का सर्कुलेशन भी जरूर बढ़ा है। लोगों से बातचीत के आधार पर ऐसा मेरा मानना है।
जब किसी को कुछ कहते नहीं बनता तो मीडिया को ‘लहर-जहर‘ का जिम्मेदार भी ठहराया जाता है। भई मीडिया तो जैसे बनी ही इसलिए है कि बुरी कहे तो चपाट खाए-खाए, अच्छी कहे तो भी कोसी जाए।
बु़़द्धीजीवी वर्ग इस जुबानी मारकाट वाले हुड़दंग की आलोचना कर रहा है। पर आम आदमी तो बड़े मजे ले रहा है। मजे-मजे में ही इसबार जनता बड़ी जागरूक हो गई है। बेकार की बातें पढ़ने-सुनने के बहाने कुछ काम की बातें पता लगी जा रही हैं। चाय के होटलों पर फालतूगीरी करने वाले चाय पीते-पीते चुनावी प्रक्रिया के बेसिक ज्ञान से रूबरू हुए ले रहे हैं, क्योंकि ‘‘ठेले पर चाय बेचने वाला व्यक्ति चुनावी ज्ञान का प्रोफेसर हो गया है।‘‘ पर कुछ भी कहिए इतना सुनने-देखने के बाद हम तो इस निष्कर्ष पर पहंुचे हैं कि चाहे इसबार के राजनैतिक प्रचार में जिन नए-नए सूक्ति वाक्यों और मुहावरों का प्रयोग हो रहा है, उससे आम पब्लिक आनंद लेते हुए चुनावी महापर्व का इतिहास, भूगोल व गणित सब अपनी आसान भाषा में समझ रही है।
तभी तो देखिए इसबार के चुनाव में नोटिस करने योग्य मतदान प्रतिशत बढ़ा है। महिलाएं भी वोटिंग के मामले में पुरुषों को कांटे की टक्कर देने के पथ पर अग्रसर हो चली हैं। इन्हें भी चुनावी चक्कलस में बड़े मजे आ रहे हैं। लगता है चुनाव आयोग भी मतदान प्रतिशत बढ़ने के संबंध में इस जुबानी मार-काट व चीर-फाड़ का महत्व समझ रहा है। इसीलिए आपत्तिजनक बयानबाजी करने वाले नेताओं के लिए थोड़ा नरम रुख अपनाए हुए है और खुद भी आलोचना का शिकार हो रहा है। भई कुछ भी कहिए आदर्श स्थिति तो यही है कि सार्वजनिक जीवन जीने वाले लोगों या नेताओं को अपनी जुबान पर लगाम लगानी चाहिए पर लगाम ढीली पड़ रही है और इससे देश के चुनावी महापर्व की अच्छी मार्केटिंग हो रही है तो ज्यादा चीख-चिल्लाकर गला खराब करने की क्या जरूरत है। बस देश की आम जनता से अपील है कि इस बार के नहीं बल्किी हर बार के चुनाव में, ‘वोट करते रहिए शान से।‘‘

नोट-मेरी चुनावी टिप्पड़ी को अन्यथा न लें। किसी खास राजनीतिक या धार्मिक विचारधारा से प्रेरित होकर चुटकी नहीं ली है। आम महिला हंू, इसलिए अपने आम से विचारों को आम जनता के हक में लिखने का मन किया तो लिख दिया। वैसे भी आम का मौसम है। आमों के साथ आम चुनाव के रस का आनंद लीजिए। धन्यवाद!

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